Mahaguru Ji says burning Manusmriti has no value in Sanatan Dharma. Sanatan Dharma is not a religion of book, they can burn as many books as someone wants

Mahaguru Ji said, “हिंदू धर्म में कोई भी किताब पूजने के लिए नहीं होती। यहां तक यदि यह कहें, कि सनातन वैदिक धर्म में किताबों का कोई महत्व नहीं है, तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। कितनी प्रतिलिपियां ब्राह्मणों की ठंडी का निवारण करने के लिए जला दीं गईं है। कम से कम करना है, तो स्मृति को पढ़ो, किसी किताब से नहीं, किसी गुरु से। क्योंकि स्मृति वेदों का सार है। वेद ब्रह्मांड के सार हैं। गीता स्मृति का सार है, और प्रश्नोत्तर के रूप में है। तो स्मृति यदि आप स्वयं से पढ़ना चाहेंगे तो आप केवल भटकेंगे

किसी भी गुरु से इसका ज्ञान जिज्ञासु बनकर ग्रहण करे, वही सच्चा ब्राह्मणत्व है। जिन्हें लगता है, स्मृति जलाकर वह धर्म व्यवस्था पर प्रहार कर रहे हैं, वह सब निहायती मूर्ख हैं। स्मृति ब्रह्मांड की प्रत्येक रोशनी में अमर है। स्मृति से जिसे कलह हो, वह सूर्य की रोशनी लेना बंद कर दे |

जिन्हें यह लगता है कि स्मृति कभी हिंदू राज्यों के संविधान की तरह थी, तो यह भी गलत है। जितने भी वेद, पुराण, स्मृतियां हैं, यह ब्राह्मणों को धर्म का ज्ञान देने के लिए हैं। फिर वह ब्राह्मण ही संविधान हो जाता है, और धर्म तथा विवेक के उपयोग से शासन किया जाता है।

स्मृति में यह लिखा है, तो कभी ऐसा ही होता होगा, यह मूर्खता पूर्ण है। स्मृति एक गाइड की तरह है। धर्म राज्य में स्मृति ब्राह्मण का गाइड रहती है, ब्राह्मण राजा का गाइड रहता है, और अपने धार्मिक ज्ञान, तथा विवेक से राजा और राजपुरोहित राज्य का संचालन करते हैं।

कभी किसी भी समय में, किसी को भी, स्मृति के अनुसार दंड कभी भी प्राप्त नहीं हुआ है। और न ही, स्मृति के अनुरूप किसी ने कभी भी आचरण किया है। समाज के नियम स्मृति + विवेक के आधार पर मौखिक बनाए जाते हैं, हां, स्मृति के विपरीत धर्म राज्य में कोई नहीं जा सकता।”

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